नरसिंहपुर ! 23 सितम्बर 2026
नरसिंहपुर। गुदरी बाजार कंदेली स्थित 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व के दौरान व्यवधान और चप्पल फेंके जाने की शिकायत का मामला शुक्रवार रात आपसी सहमति के बाद समाप्त हो गया। मंदिर समिति ने कोतवाली पुलिस को पत्र देकर स्पष्ट किया कि बातचीत के बाद सामाजिक सौहार्द कायम है और अब वह किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं चाहती। कोतवाली थाना प्रभारी गौरव चाटे ने भी दोनों पक्षों में सहमति बनने की पुष्टि की है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक अहम सवाल जरूर खड़ा होता है- यदि मामला बातचीत और आपसी सहमति से समाप्त हो सकता था, तो शिकायत सामने आने के बाद खबर प्रकाशित करने से पहले संबंधित परिवार का पक्ष क्यों नहीं जाना गया?
मंदिर समिति की शिकायत में जिन दो व्यक्तियों के नाम सामने आए, वे एक मुस्लिम परिवार से बताए जा रहे हैं।
परिवार का कहना है कि मंदिर से जुड़े लोगों द्वारा उनके घर के सामने कथित तौर पर अनावश्यक वाहन खड़े किए जाने और तेज आवाज में साउंड बजाए जाने को लेकर उन्होंने अपनी बात शांतिपूर्ण और सकारात्मक तरीके से मंदिर प्रशासन के सामने रखी थी।
परिवार का आरोप है कि उनकी इस शिकायत को बाद में अलग रूप देकर उनके खिलाफ शिकायत कर दी गई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष के दावों को इसी रूप में देखा जाना चाहिए।
एक आवेदन, खबर और फिर सुलह… सवाल मीडिया की भूमिका पर भी
मामले का दूसरा पहलू मीडिया से जुड़ा है। परिवार का कहना है कि कुछ कथित मीडियाकर्मियों ने दूसरा पक्ष जाने बिना केवल शिकायत/आवेदन के आधार पर खबर प्रकाशित कर दी, जिससे परिवार को सामाजिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।
पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है कि किसी भी विवाद में आरोप को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाए और संबंधित पक्ष का पक्ष जानने का प्रयास किया जाए।
खासकर ऐसे मामलों में, जहां धार्मिक स्थल और अलग-अलग समुदायों से जुड़े लोग शामिल हों, खबर प्रकाशित करते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी होती है।
80 वर्षीय बुजुर्ग मां की हालत को लेकर परिवार चिंतित
परिवार का कहना है कि पूरे घटनाक्रम से उनकी करीब 80 वर्षीय बुजुर्ग मां मानसिक रूप से आहत और सदमे में हैं।
यह दावा भी परिवार की ओर से किया गया है।
सवाल यह है कि यदि किसी परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, मानसिक परेशानी होती है और बाद में शिकायत करने वाला पक्ष ही पुलिस को लिखकर कह देता है कि अब किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है, तो उस परिवार की प्रतिष्ठा और मानसिक पीड़ा की भरपाई कौन करेगा?
धर्म नहीं, प्रक्रिया महत्वपूर्ण
यह मामला हिंदू-मुस्लिम विवाद का रूप देने से ज्यादा न्यायपूर्ण प्रक्रिया और जिम्मेदार पत्रकारिता का विषय है।
मंदिर में धार्मिक आयोजन के दौरान व्यवधान का आरोप गंभीर है और उसकी शिकायत करना किसी भी संस्था का अधिकार है। लेकिन उसी तरह शिकायत में नाम आए लोगों को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
न मंदिर को कटघरे में खड़ा करना समाधान है, न किसी समुदाय को। और न ही किसी शिकायत को अंतिम सत्य मानकर दूसरे पक्ष को सुने बिना निष्कर्ष निकालना पत्रकारिता का सही तरीका हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा संदेश यही है..
पहले दोनों पक्ष सुनिए, फिर खबर लिखिए। शिकायत और आरोप को तथ्य का अंतिम रूप मत दीजिए।
क्योंकि एक खबर कुछ मिनटों में प्रकाशित हो सकती है, लेकिन उससे किसी परिवार को लगी सामाजिक और मानसिक चोट का असर लंबे समय तक रह सकता है।
पोलखोल न्यूज़ का सवाल सीधा है- सुलह हो गई, मामला खत्म हो गया; लेकिन बिना दूसरा पक्ष सुने जो सामाजिक नुकसान हुआ, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?







