नरसिंहपुर, 20 दिसम्बर 2025।
नरसिंहपुर के स्टेडियम ग्राउंड में राज्य स्तरीय श्रमिक खेलकूद प्रतियोगिता का भव्य आयोजन हुआ। मंच से श्रमिकों के सम्मान, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और खेलों से जुड़ाव की बातें की गईं। मंत्री, जनप्रतिनिधि और अधिकारी विजेताओं को पुरस्कार देकर श्रमिक सम्मान का संदेश दे रहे थे।
लेकिन इसी आयोजन स्थल से महज 200 मीटर की दूरी पर एक और तस्वीर थी.. खामोश, पीड़ादायक और सवाल खड़े करने वाली।
नगर पालिका के सफाईकर्मी, जिन्हें महीनों से मानदेय नहीं मिला, धरने पर बैठे थे। वही सफाईकर्मी, जिनकी बदौलत शहर स्वच्छ रहता है, जिनके श्रम से हर आयोजन चमकता है, आज खुद अनदेखी और उपेक्षा का शिकार हैं।
एक ओर मंच पर तालियाँ, सम्मान और पुरस्कार…
दूसरी ओर उसी वार्ड में वेतन के इंतज़ार में बैठे असली श्रमिक।
यह विरोधाभास कई सवाल छोड़ जाता है..
क्या श्रमिक सम्मान सिर्फ मंच और कार्यक्रमों तक सीमित है?
क्या जश्न मनाकर वास्तविक पीड़ा को ढंका जा सकता है?
जब अपने ही शहर के सफाईकर्मी खुश नहीं हैं, तो श्रमिक कल्याण की बातें कितनी सार्थक हैं?
चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन सफाईकर्मियों की मांगों पर अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
अब निगाहें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर हैं, क्या वे इस खामोश धरने की आवाज़ सुनेंगे या आयोजन की चकाचौंध में यह पीड़ा यूँ ही दब जाएगी?
यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, यह संवेदनाओं की परीक्षा है।
और सवाल यही है, क्या इसे जश्न कहा जाए या आत्ममंथन का














